Reservation policy in India and its disadvantages


 आरक्षण

 आरक्षण का अर्थ है चारों ओर से रक्षा करना। बिना किसी जाति, धर्म और सांप्रदायिक भेदभाव के एक समान संरक्षण प्रदान कर सभी वर्गों को सामूहिक विकास का अवसर प्रदान कर देश की सामान्य जनता को विकास की ओर अग्रसर करना। एक कुशल शासक अपने देश की प्रत्येक जनता को समभाव से विकास की ओर प्रेरित कर अपनी दूरदर्शिता और विवेकपूर्ण निर्णय से अमीरी-गरीबी के बढ़ते दरार को समाप्त कर एक निश्चित, सीमा तय करता है। जिसमें 'उसके देश के सभी नागरिक खुशहाल जीवन यापन कर सकें। आरक्षण शब्द का प्रयोग देश में सर्वप्रथम लार्ड मिंटो ने 1909 में भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत किया था। जिसके अनुसार भारत के कुछ वर्गों को निर्वाचन में पृथक प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई थी। इसके पश्चात आरक्षण शब्द का प्रचार-प्रसार दिन-ब-दिन बढ़ता चला गया। स्वाधीनता के पश्चात हमारे संविधान निर्माताओं ने महात्मा गांधी व अन्य समाज सुधारकों के प्रयत्नों से प्रभावित होकर स्वतंत्र भारत के संविधान में देश की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान हेतु अनेक प्रावधानों का समावेश किया।


भारत के संविधान में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को देश की जनसंख्या का एक ऐसा विशेष वर्ग माना गया है जिसे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 341 तथा 342 में विशेष प्रावधान लिपिबद्ध किया गया है इसके अनुसार इन जातियों को राजनीति, अर्थ-व्यवस्था, शिक्षा तथा संस्कृति के क्षेत्र में अनेक सुविधाएं दी गईं। इस मद्देनजर आरक्षण बिल जिसे 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट पर सरकारी फैसले की घोषणा की कि सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए केंद्रीय व सार्वजनिक उपक्रमों में 27 प्रतिशत पद आरक्षित रहेंगे और इस प्रस्ताव ने एक ऐसे ज्वालामुखी रूपी विद्रोह ने को भड़काया जिसे वर्तमान समय तक बुझाया न जा सका। बल्कि यह आग दिन-ब-दिन फैलती ही जा रही है जिसके अनेकों दुष्परिणाम हमारे सामने मुंह बाएं खड़ी हैं। भारतीय संविधान में यह सम्मिलित है कि देश के किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। संविधान की इस दोहरी नीति के कारण धर्म निरपेक्ष भारत में एक जटिल समस्या वर्तमान समय में उत्पन्न हो चुकी है जिसका समाधान नहीं निकाला गया तो देश अशांति, विद्रोह और विभाजन के द्वार पर खड़ी हो जाएगी। आरक्षण का मूल उद्देश्य था देश के उन गरीब और अत्यंत पिछड़े वर्ग को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना ताकि उनकी पाश्विक जीवन शैली और अमानवीय सामाजिक तथा आर्थिक दशा में सुधार लाया जाए। जिसमें कुछ निम्न जातियों की संख्या वस्तुत: अधिक थी। परंतु इसका मूल महत्व केवल उन्हीं वर्गों तक सीमित न रहकर साधारण और उच्च आमदनी वाले निम्न वर्गों ने भी जाति के नाम पर उठाया। जिसके परिणाम स्वरूप देश में उच्च जाति के सामान्य व गरीब जनता के साथ न्याय नहीं हो सका और उनकी स्थिति क्रमिक बिगड़ती चली जा रही है। आरक्षण के बढ़ते दुष्परिणाम के कारण ही देश में जातिय हिंसा बढ़ रही है। हर तरफ जाति और धर्म के कारण हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है। देश के राजनेता इस सुलगती हुई ज्वालामुखी को गंभीरता से न लेकर अनपा स्वार्थ साधने में लगे हुए हैं। जातिय मतभेद बढ़ता जा रहा, जिससे विद्रोह और एक दूसरे के प्रति विद्रोह की भावन प्रबल होती जा रही है। आरक्षण का प्रतिपादन जिस शुभ भावना से प्रेरित होकर लिया था, वो आज अपने मूल विषय-वस्तु से पृथक होकर सामाजिक अराजकता फैला रही है। आरक्षण के मूल आधार में परिवर्तन अति आवश्यक हो गया है। आरक्षण को सिर्फ जातिय आधार पर देश में लागू करना किसी भी प्रकार से न्यायसंगत नहीं है। क्योंकि इससे उच्च जाति के अंतर्गत आने वाले गरीब व साधारण जनता के विकास का उचित अवसर नहीं मिल पाता है। भले ही आरक्षण 27 प्रतिशत अनुसूचित जातियों व जनजातियों को केंद्रीय व सार्वजनिक कार्यों में लागू होने वाला हो अथवा केंद्रीय कार्यों व संस्थानों में पदोन्नति के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण हो । आरक्षण का आधार आर्थिक आय पर आधारित हो, जिससे एक न्यायसंगत कदम उठाकर जातिय आधार को सदा-सदा के लिए समाप्त कर दिया जाए जिसके फलस्वरूप आर्थिक रूप से पिछड़ी भारतीय जनता को अधिक से अधिक लाभांवित किया जा सके। धर्मनिरपेक्ष भारतीय संस्कृति की उदारवादी परंपरा के अंतर्गत सभी जाति, धर्म व समुदाय के लोग अपने आर्थिक विपन्नता के आधार पर आरक्षण के नए नियम का भरपूर लाभ उठा सकें। यही कदम सराहनीय होगा, क्योंकि इसी से शिक्षा और सामाजिक विकास कर देश को समभाव व एकता के सूत्र में बांधकर प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है, जिससे पुन: एक बार जाति व धर्म के नाम पर देश को बंटने से रोक सकें।


आरक्षण की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए इसे पूर्णत: समाप्त न करके इसे सही ढांचे में फिर से देखने की आवश्यकता है जिससे हिंदू-मुस्लिम के साथ-साथ अंतर्जातीय समस्याओं का समाधान भी मिल जाए।


● माधुरी सिंह

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