Social problems of India and its solutions (निबंध in हिंदी)

 




भारत की सामाजिक समस्याएँ और उनके समाधान

 

भारत सवा सौ करोड़ वाला विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र का देश है | हमारा देश अनेकता में एकता और अखंडता को स्थापित कर विश्व के लिए एक मिशाल बन चुका है |अनेक सामाजिक बुराईयों और समस्याओं को झेलते हुए हम नित नए आयाम  की ओर अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं | भिन्न भिन्न जाति और भाषा के लोग एक साथ इस भारत भूमि को मिलकर विकास की ओर ले जाने में अपना योगदान दे रहे हैं |परन्तु फ़िर भी भारत की अनेक़ सामाजिक समस्याएँ जो प्राचीन समय से हमारे विकास यात्रा में बाधा बनी है वो आज भी नागफनी बन कर समय समय पर विकास के रथ को रोक देती हैं| हम निरंतर नए पुराने रीती रिवाजों के नाम पर या  कभी प्राकृतिक प्रकोप के रूप में तो कभी गरीबी , भुखमरी के रूप में अनेक समस्यायों से जूझते रहते हैं | इससे भारत के विकास प्रक्रिया तो धीमी पड़ती हीं है साथ में मानवता और अनेक संवेदनाओं का भी हनन करती है |

२१वीं सदी के इस आधुनिक और अंकदर्शी युग में जहाँ विश्व के अनेक देश हमसे प्रतिष्पर्धा रखते हैं और हम शायद कहीं न कहीं तेजी से विकासशील देश से विकसित देश बनने की ओर बढ़ रहे हैं पर बेरोजगारी ,दहेजप्रथा ,बाल- विवाह, कन्या भ्रूण-हत्या , गरीबी ,बाल मज़दूरी , अशिक्षा ,स्त्रियों से भेदभाव ,जातिवाद,  छुआछूत ,अपराध ,अपहरण ,स्वास्थ संबंधी समस्याएँ ,भ्रष्टाचार और धर्म के नाम पर आपसी टकराव (सांप्रदायिकता)स्वतंत्रता के बहत्तर सालों बाद भी अपनी जड़ जमाये हुए बढ़ती जा रही है और हमारे समाज को खोखला करती जा रही है |पर विडंबना है की इसके प्रति सभी निशब्द और निश्चिन्त है ,सिर्फ़ बड़ी बड़ी बातों से हीं सब अपनी जिम्मेदारी निभा कर संतुष्ट हो जाते हैं |

आधुनिक भारत की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है दहेजप्रथा \ हालाँकि दहेज वह धन है जो वधु पक्ष अपनी कन्या को ख़ुशी पूर्वक विवाह के पश्चात् सूखी और संपन्न जीवन जीने के लिए देते हैं |जो शायद  वैध भी है परन्तु अगर यहीं धन वर पक्ष दबाव दे कर शर्तों के साथ विवाह करने के लिए मांगता है तो वह अवैध और दहेज कहलाता है |भले हीं यह प्रथा के नाम पर प्राचीन समय से चलती आ रही है पर आज के वर्तमान समय में जहाँ लड़के लड़कियों के काविलियत में कोई अंतर नहीं रह गया वहाँ यह प्रथा एक सामाजिक समस्या ही नहीं बल्कि एक अभिशाप बनती जा रही है|  महर्षि मनु ने भी मनुस्मृति में यह वर्णन किया है की यदि कन्या पक्ष वर पक्ष को धन इत्यादि देता है तो इस प्रकार के विवाह को असुर विवाह की संज्ञा दी जाती है|पर यह प्रथा उच्च कुल से लेकर सभी कुल एवं जातियों में किसी न किसी रूप में चलती रहती है |जैसा की तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भी इस प्रथा के बारे में वर्णन किया है -

"कही न जाए कछु दाईज भूरी ,

 रहा कनक -मणि मंडप पूरी \"

परन्तु इस प्रसंग में तुलसीदास जी ने जिस प्रेम उपहार का वर्णन किया है वह स्नेह और वात्सल्य का प्रतीक है जो वर पक्ष को दिया जाता था |लेकिन वर्तमान समय में कन्या के विवाह के समय वर पक्ष को दहेज देना आवश्यक ही नहीं बल्कि सामाजिक दिखावे के लिए अनिवार्य बनता जा रहा है |दहेज के बिना विवाह संभव हीं नहीं ,कभी कभी तो विवाह के पश्चात् भी वर पक्ष की लालच बनी रहती है और अपनी मांग पूरी न होने पर वधु की हत्या जैसे जघन्य अपराध भी करने से नहीं कतराते हैं |इस प्रथा का सबसे अधिक दुष्प्रभाव मध्यमवर्गीय परिवारों और निम्नवर्गीय परिवारों पर पड़ता है \वे विवाह में दहेज देने और विवाह सम्बन्धी खर्चो के लिए कर्ज लेते हैं और उस कर्ज के बोझ से जीवन भर गरीबी के साथ जूझते रहते हैं |

समाज में कन्या भ्रूण हत्या ,और कन्या के प्रति भेदभाव जैसी समस्याएँ दहेज के ही दुष्परिणाम हैं |लोग कन्या को हीं अपनी गरीबी का कारण मान लेते हैं,क्योकि विवाह के समय दहेज उनके लिए अभिशाप है इसलिए जन्म से पूर्व ही उनको ख़त्म कर माता -पिता और समाज निश्चिन्त हो जाना चाहता है | लेकिन कोई भी इस समस्या को जड़ से नहीं हटाना चाहता है \ पर क्या वास्तव में कोई समाधान नहीं है ये विचारनीय है | अगर समाज के हर व्यक्ति के मन में निश्वार्थ भावना और दृढ निश्चय हो तो यह कोई समस्या ही न बन पाए \हमारे संविधान में भी दहेज एक दंडनीय अपराध है \दहेज प्रथा की क्रूरता और भयावहता से क्षुब्ध होकरमहात्मा गाँधी जी ने सन 1928 में ही कहा था - "दहेज की पातकी प्रथा के खिलाफ़ जबरदस्त लोकमत बनाया जाना चाहिए और जो नव युवक इस प्रकार गलत ढंग से लिए गए धन से अपने हाथों को अपवित्र करे उन्हें जाती से बहिष्कृत कर देना चाहिए \इसमे तनिक भी संदेह नहीं है की यह एक हृदयहीन बुराई है "\

तो क्या आज के वर्तमान समय में इस बुराई का अंत नहीं होना चाहिए ? इस समस्या के अंत के लिए सामाजिक जागरूकता के साथ मानसिक विकास को भी बढ़ावा देना आवश्यक है विवाह के समय  अनापेक्षित दिखावे पर रोक लगाना आवश्यक है \विवाह के अनावश्यक नियमों में बदलाव लाकर इस प्रथा को रोका जा सकता है \ सरल ,साधारण और अंतरजातीय विवाह के प्रोत्साहन अतिरिक्त विवाह के महत्व को परिवार और समाज को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है \अन्यथा ये एक ऐसी सामाजिक कुरीति बन जाएगी जिसके लोभ और लालच की अग्नि में हमारा भविष्य जल कर भष्म हो जायेगा और केवल भ्रष्ट समाज का बोलबाला रह जायेगा जो देश ,समाज और मानवता के लिए हानिकारक बन जायेगा \

हमारी दूसरी सबसे विशाल और मुख्य सामाजिक समस्या है बढती बेरोजगारी \भारत जैसे विशाल जनसँख्या वाले देश में बेरोजगारी एक ऐसी समस्या है जो समाज में अराजकता , असंतोष और अशांति का मुख्य कारण बन रहा है \बढती आबादी और सरकार के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से नई नौकरियो की भारी कमी से बेरोजगारी बढती जा रही है \देश के  ज्यादातर युवा बेरोजगार हैं और एक सम्मानजनक नौकरी के लिए प्रतिदिन संघर्षरत हैं एक आंकड़े के मुताविक 2018 -2019 में बेरोजगारी दर बढ़ कर 8.30 %अपने अधिकतम दर तक पहुँच गया है |जो एक संकट और चिंता का विषय होना चाहिए \बेरोजगारी की हालत में परिवार के लिए जीवनोपयोगी आवश्यकताओं को भी पूरा कर पाने में असमर्थ होजाते हैं \

बेरोजगारी के कारण समाज में अराजकता ,असंतोष और अशांति का माहौल बनता है \बढ़ती आबादी और सरकार के गैर जिम्मेदाराना रवैए से नई नौकरियों की बहाली बिलकुल बंद हो गयी है \जिससे लोगों में शिक्षा और समाज के प्रति अविश्वास जन्म लेने लगा है \

कहा गया है -बुभुक्षि किं न करोति पापम् "                                  

अर्थात् भूखा मनुष्य कौन स पाप नहीं करता \ बेरोजगारी के कारणउपजे भूख और लाचारी ने समाज में भ्रष्टाचार ,क़त्ल ,बेईमानी ,चोरी और अविश्वास को बढाया है \ अब तो यहाँ तक नौबत आ गयी है की पढ़े लिखे डॉक्टर ,इंजिनियर,भी उचित समय पर रोजगार न मिल पाने के कारण कर्ज के बोझ से निकलने के लिए आत्महत्या तक कर रहें है ऐसे में सरकार को उचित कदम उठाना आवश्यक है |बेरोजगारी को कम करने के लिए व्यापार को बढ़ावा देना होगा \और व्यापार को सफ़ल बनने के लिए भ्रष्टाचार को भी ख़त्म करना होगा \नए सिरे से शिक्षा नीतिओं पर पुनर्विचार कर उनमे संशोधन करना होगा \सैद्धांतिक शिक्षा के साथ -साथ प्रायोगिक और बौद्धिक शिक्षा को बढ़ना होगा ताकि रोजगार के लिए व्यक्ति स्वयं सक्षम होकर समाज और देश के उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे \आज हर नागरिक को अपने अन्दर की योग्यता और काबिलियत को पहचानते हुए अर्थोपार्जन के कोई न कोई मार्ग स्वयं निकलना होगा \ हमें लघु और घरेलु उद्योगों को ईमानदारी से पुनर्जीवित करने का प्रयास करना होगा \जिससे लाखों लोगों के जीवन यापन के द्वार खुल जाए और एक सुदृढ़ भारत का निर्माण संभव हो सके \

वैसे तो हमारी कई और भी समस्याएँ है पर भ्रष्टाचार और अशिक्षा देश को खोखला कर रही है \ भ्रष्ट तंत्र और भ्रष्ट नौकरशाही व्यवस्था ने तो हर उस समस्या को नासूर बना दिया जिसे मामूली रूप से हल किया जा सकता था \ कोई भी काम बिना घुस और पैरवी के पूरा हो पाना असम्भव हो गया है \  इसपर शिकंजा कसना बहुत जरुरी है \शिक्षा के प्रति लापरवाही और उसके महत्त्व से अनजान समाज का बहुत बड़ा तबका आज भी अशिक्षित जीवन के अंधेरो में भटक रहा है \सरकारी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति हो रही इस पर अंकुश लग्न बहुत जरुरी है नहीं तो हमारा देश कई भागो में बंट जायेगा और हमारी अखण्ड एकता और संस्कृति धूमिल होने में देर नहीं लगेगी \हमें संस्कारो और सामाजिक जिम्मेवारियो को निभाते हुए देश को समस्याओं पर भी विचार करना चाहिए \ स्वास्थ से लेकर सुखी जीवन के सभी मुलभुत समस्याओं से निपटने के लिए हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो जाना चाहिए \

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